Young Men at Sea: Seeing Death in Slow Motion

Author: 
Sanjiv Jani

Sanjiv Jani is a resident of Rajkot in Saurashtra, also known as Sorath of Kathiawar peninsular region of Gujarat. By profession Sanjiv is Superintendent of Central GST but is a man of varied interests such as stage and TV artist, writer director of short films with social message and an activist. Saṇjiv has taken up many social causes like campaign against noise pollution etc. Sanjiv is passionate about his favourite causes and ever willing to go the extra mile to fulfill his dreams.

Have you ever seen a real hell of a danger in your life coming towards you in slow motion? If an accident happens, it is mostly a matter of fraction of seconds. But what if you are about to witness those seconds stretched into time seem immemorial?

जून २०१० की कोइ एक तारीख. एजंटने दोपहर को ही बता दीया था कि वेसल लेइट नाइट को आ सकता है. हालांकि बॉडिँग मेरे कलीग कामानी का था पर मुज़े उसके साथ जाना था क्युंकि वह उसका फस्टँ बॉडिँग था और प्रथा यह थी कि पुराना अफसर नये को पहली बार गाइड करने साथ में जाये. जेट्टी पर रात को करीब ११:०० तक पहुंच गये थे. लॉन्च के ड्राईवर अब्राहम और उसके एसीस्टंट जीम्मीने हमको सलाम कीया. वैसे मैंने गाडीमें से उतरते ही मेहसूस किया था कि हवा कुछ तेज़ चल रही है. दरियामें जाते वक्त मौसम ठीक होना चाहीये. लॉन्च मे बैठते ही अब्राहम को पूछा, 'मौसम कैसा है'. अब वो सब तो ठहरे दरीया-छोरू.

 

आत्मविश्वास से भरपूर जवाब मिला, 'कांई वांधो नथी सायेब...आवी जाओ बोट मां'...

 
 

नीकल पडे काले घने अंधेरे में पानी के अंदर दरिया से भिड़ने.. दरीया थोडा रफ लग रहा था. छोटे छोटे पर काफी ताकतवर मौजे लॉंच के साथ टकरा रहे थे जिसकी आवाज़ की भयानकता को लॉन्च के डिज़ल ईंजन की ककँश आवाज़ दबा देती थी.

 
 

The cargo ships parked at the anchorage due to draft (depth of water) problem wait for the floating cranes to come alongside them. Subsequently these floating cranes are used to discharge the bulk cargo with the help of grabs (scoops) from the ship into small barges.

 
 

These cranes weigh around 60 tonnes with grabs each of 15 tonne hovering over the ship to scoop up the dry bulk cargo.

 

आधे घंटे की सफर के बाद मध्यरात्रि को लॉन्च पर से ही एंकरेज पर पाकँ हुए वेसल को एजंट ने वीएचएफ के ज़रिये identify किया. एजंटने केप्टन को inform कीया कि कस्टम्स ऑफिससँ बॉडिँग प्रोसीजर के लिये आ रहे है. एजंटने बताया कि यह शीप का 'मेइडन वॉयेज' है मतलब की शीपयाडँ में तैयार होने के बाद उसका पहला सफर है! ये तो खुशी का ऐसा मौका था जैसे कि पडौसी की ब्रॉंड न्यू कार का पहला चक्कर हमें मिला हो.

Vessel name : Sea of Harvest.
Vessel type : Bulk Carrier.
Gross Tonnage : 42,751 MT
Built year : 2010.
Captain on the Voyage : Hang Lee Quiam (Chinese).
Crew : 22.

 

उस वक्त पता नहीं था कि वो खुशी ज़्यादा देर टिकनेवाली नहीं है। हवा कि रफ्तार धीरे धीरे बढ़ रही थी। मैंने बोर्डिंग्स में windspeed का काफी अभ्यास किया था। तरह तरह के gadgets के बारे में जानकारी रखना मेरा शौक है। जैसे ही बोर्डिंग फ़ार्मैलिटि पूरी होती, मैं Wheel House (जहां से शिप चलती है) में chief officer के पास जाके बैठता।

 
 

Wheel House (जहां से शिप चलती है)

 

Windspeed is measured by anemometer on a Beaufort scale of 0 to 12.
0: Calm-Smoke goes straight up@1mph
4: Moderate breeze@18mph-Small branches move
6: Strong breeze@31mph-Large branches move; wires whistle
12: Hurricane@73mph & plus-Widespread destruction

अब लॉन्च चलानेमें अब्राहम को दिक्कतें आ रही थी। एक मौज़ा लॉन्च को ऊपर उछालता और दूसरा उसे पानी के अंदर धकेलता। जून-जुलाई में कभी कभी हवा दरियामें विलेन का काम करती है, । शिप से VHF पर मेसेज मिला कि हवा की गति 25mph है। महामुश्किल से अब्राहम ने हमें शीप के पास पहुंचाया, जहॉं पर वो फ्लोटींग स्ट्रक्चर हमारे पहले ही पहुंच चूका था. हमारी लॉन्च उस स्ट्रक्चर के alongside कर के अब्राहम ने हम सब को एक के बाद एक उस स्ट्रक्चर पर चढ़ा दीया. अब हम उस स्ट्रक्चर पर खडे, शीप क्रू का इंतज़ार करने लगे जो कि रॉप-लेडर डालकर हमें शीप पर चढनेमें मदद करने वाले थे.

It was 3:15 AM. The strong wind was now rising to a scale-6 i.e. winds as in tempest. The buffering tyres of both gigantic conveyances were brushing each other creating horribly loud squeaking noise. Suddenly, the anti-corrosive polypropylene rope of 4 inch diameter which was connecting the floating crane alongside ship just snapped by the force of the wind and opposite pressure of both giant conveyances, like a stretched chewing gum is broken by a kid with both hands.

उस वक्त Mr. Kamani, एजन्ट, मैं और ड्राफट सवेँयसँ फ्लोटींग स्ट्रक्चर पर ही थे. जैसे ही शीप के साथ बांधा हुआ रस्सा तूटा, वो साठ हज़ार किलो का स्ट्रक्चर जो कि बिलकुल शिप को चिपक कर तैर रहा था, शिप से दूर जाने लगा. उसके एंजिन ड्राइवर को मैंने बाहर से पाइलोट केबिन में खौफनाक चहेरा ले के दौडकर जाते हुए देखा. हमें बाद में पता चला था कि वो इंजन स्टाटँ कर के स्ट्रक्चर को शिप से दूर safe distance पर ले जाना चाहता था. पर उसे समय ही नहीं मिला. स्ट्रक्चर के पीछे से आ रही भयंकर तूफानी हवाने उस राक्षसी स्ट्रक्चर को शीप की ओर ऐसे खदेडा मानो हम अपने पांव से शू-बोक्स को धकेल रहे हो.

The floating structure, like a newly divorced partner, went away from the ship for 50 feet roughly. But to our horror, the structure started to return back to ship as if a sudden emotional surge for its beloved partner may have become a reason for its thoughtful comeback. At that time my mind was closed to think anything, but afterwards I recalled the last scene from Hollywood movie `Speed’ where the Metro coach comes out on the road bursting out from a subway station, and comes to a screeching halt just millimeter away from an SUV.

50 फिट. 40 फिट. 20 फिट. अब वो शीप के साथ टकराने वाला था. हम सब उस फ्लोटींग प्लेटफोमँ पर बीचोबीच खडे थे. मैं और कामानी एकदूसरे के हाथ पकड कर, प्रभुस्मरण करते हुए खडे थे - एक धीमी मौत का इंतज़ार करते हुए. हमारे चहेरे पर मान लो, बफँ की पतँ जमी हो ऐसे भाव-शून्य हो गये थे. लगता था कि बचने वाले ही नहीं है फिर कुछ प्रतिक्रिया देकर क्या करेंगे!

The whole scene was like a tableau in a climax of a Broadway play. All frozen and stupefied. 10 feet. 5 feet. 1 feet. With a deafening bang, the structure finally hit the brand new 42000 metric tonne massive vessel.

उस रात हम बच पाये उसकी सबसे बडी वजह था शीप का खुद का वज़न. वो फुल्ली लोडेड थी - ओस्ट्रेलियन कोकींग कॉल से भरी हुइ. ये बिलकूल ऐसी घटना थी जैसे हाथी के पेट में हिरन अपना सर टकरा रहा हो. फ्लोटींग स्ट्रक्चर की जगह हमारी लोन्च होती तो वो शीप से टकरा कर तुरंत ही उलटी हो जाती, मान लो बील्ली हाथी के पैर से टकरा कर मर जाये.

With the deafening thud, the floating platform hit the ship and created a dent in the belly of the vessel peeling off the new paint in surrounding area where it hit. But miraculously amazing truth was that we all were ALIVE. The floating structure was fortunate to maintain its stability and only swerved for few seemingly long seconds (ah, those fate-deciding seconds…). It took so much time to sink in the fact for us that we have just survived from a mid-sea mishap.

 

शीप क्रू ने 'रॉप-लेडर रेडी है' का सिग्नल दिया.

 
 

हतप्रभ Mr. कामानी थोडी देर तक प्लेटफोमँ पर ही बैठे रहे.

 
 

शीप पर चढते ही एजन्ट केप्टन पर सवार हो गया कि शीप के घटीया क्वालिटी के रॉप के तूटने से ही स्ट्रक्चर शीप से जा टकराया.

 
 

In broad daylight, inspection of damage was made. Both the conveyances were insured so matter sorted out soon between agent and the Master of the Vessel.

 
 

Soon after, the barges waiting in distance since few hours, came flocking alongside the floating structure like hungry seals to be catered with coal as their food!

 
 

शीप से स्ट्रक्चर और स्ट्रक्चर से एक के बाद एक बाजीँस पर से होते हुए हम लॉन्च पर पहुंचे. अब्राहम और जीम्मी हमारे स्वागत के लिये लॉन्च पर निलेँप भाव से ऐसे खडे थे मान लो रात में कुछ हुआ ही नहीं.

 

उनके लिये ये गालिब के वह प्रसिध्ध शेयर को गुनगुनाने जैसा साहजिक था जो उन दरिया छोरू के लिये थोडे अलग अल्फाज़ में पैश है: ये रोज़ी कमाना नहीं आसां ग़ालिब, इतना तो समझ लीजिये. एक दरिया की आग है, जिसे चिर के वापस घर आना है…

 

We bade adieu to the Sea of Harvest receding on the horizons, thanking the Supreme Power and all the unseen cosmic forces which saved us that night. Amen.

 

Comments

Quite a story of good and bad luck. In the end, all's well that ends well.

Truly said sir. It was matter of luck only.

A really scarry event written in Bollywood script style. Thankfully everything ended well.

Yes you are right. I have tried to write in the screenplay style.

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