A selection of poems in Hindi

Author: 
Ashok Kumar

Born in 1967, Ashok Kumar had his initial schooling in Bulandshahar, UP and Delhi. Ashok graduated from M M H College, Ghaziabad, UP in B.Sc. Biology. He joined Indian Customs in 1991 at Mumbai. He is a recipient of the President Award in year 2012 for meritorious services in the field of intelligence and investigations.

Presently Ashok is working as Assistant Commissioner of Customs at Chennai. In addition to his office work he is also passionate about Cycling, Tracking, Marathons, Badminton, Bird Photography but the love of his life is writing poetry in Hindi.

His anthology of poems can be read on his Facebook page "अंकुरण-अशोक की कविताओं का संकलन" and his bird photography is available on his Facebook page "अशोक वाटिका- Nerul Bird Sanctuary".

Ashok's wife, Pushpa, is a marathon runner and a regular participant. Recently she has completed 100 km in a day challenge organised by Pinkathon at Ambey Valley. Their son, Vaibhav, is an alumnus of National Institute of Design, Ahmedabad and at present working as Designer with VIP Industries Luggage Division. Their daughter, Swati, graduated in Mass Communication from Symbiosis, Pune and working with a NGO in Delhi.

Editor's Note: We are privileged to publish here a small selection from Ashok's anthology of Hindi poems:

  1. चलते जाओ
  2. सोचता हूँ प्रेमगीत लिखूं
  3. कुछ हसरते परवाज़ की बातें करो...

चलते जाओ

श्रीमान श्याम कश्यप बेचैन जी की एक रचना पढ़ी थी जिसमे एक माँ को अपनी बेटी से बात करते दिखाया गया है...

"कम न होंगे जिंदगी भर काम री बिटिया
है नहीं तकदीर में आराम री बिटिया
....
मायके से आ गई जब से बहु रानी
और ज्यादा बढ़ गया है काम री बिटिया"

इसका रदीफ़ "री बिटिया" मुझे बहुत पसंद आया. कुछ इसलिए भी कि मैं भी अपनी बेटी को अक्सर बिटिया कहकर ही बुलाता हूँ. इस रचना को पढ़कर मेरे मन में ख्याल आया कि मैं, एक पिता, किशोरावस्था में कदम रख चुकी अपनी बिटिया से अगर बात करूँ तो क्या बात करूंगा? सबसे पहले तो यही बात मन में आई कि साल का सिर्फ एक दिन ही बेटी के नाम क्यों हो, पूरा साल क्यों नहीं? और उसके बाद रचना बढ़ती चली गई. एक पिता का अपनी बिटिया से संवाद वर्ष 2013 में लिखी इस रचना के रूप में प्रस्तुत है...

सफर है लम्बा अभी नहीं विश्राम री बिटिया
चलते जाओ तभी मिलेगा धाम री बिटिया ....

साल का बस एक दिन ही क्यों हो दिन बेटी का
साल का हर दिन मेरा तेरे नाम री बिटिया .....

एक सुबह की चाय तेरे हाथों से और फिर
हो जाता है दिन भर का आराम री बिटिया ....

पका पकाया अक्सर नहीं मिला करता है
खुद भी करने पड़ते हैं इंतज़ाम री बिटिया .....

तू आई तो आया जैसे मौसम बसंत का
आसान हो गया जीवन संग्राम री बिटिया .....

अरमानों को पंख लगा, तेरे पापा का घर है
इस आंगन में दौड़ सुबह से शाम री बिटिया .....

धोखे भी इस जीवन में बहुत मिलेंगे तुमको
चलना तुम हिम्मत का दामन थाम री बिटिया ....

पापा की एक बात और तू गांठ बांध ले
नीयत अच्छी तो अच्छा अंजाम री बिटिया ....

कभी कभी पापा का दिल भी घबराता है
घर के बाहर मचा हुआ कोहराम री बिटिया ....

हक़ की ख़ातिर कभी कभी लड़ना पड़ता है
लड़ा नहीं जो समझो हुआ गुलाम री बिटिया ....

कभी कभी समझोते भी करने पड़ते हैं
ध्यान रहे पर अच्छा हो परिणाम री बिटिया ....

चिंतन मनन जरूरी है पर मत घबराना
अगर कभी हो जाओ कहीं नाकाम री बिटिया ...

अपने ही हाथों बनता है जीवन भला बुरा
नाज़ हो खुद पर करना ऐसे काम री बिटिया ...

राह भटक जाता है चंचल मनवा अक्सर
चलना थाम के इस घोड़े की लगाम री बिटिया ...

यहाँ कोई साथ नहीं रहता है सदा किसी के
मुझे भी एक दिन जाना बैकुण्ठ धाम री बिटिया ...


सोचता हूँ प्रेमगीत लिखूं

मेरे एक फेसबुक मित्र ने सिर्फ एक पंक्ति “सोचता हूँ प्रेमगीत लिखूं” पोस्ट की और गीत के लिए इंतज़ार करने के लिए कहा. मित्र ने तो कुछ समय बाद अपना गीत पूरा करके पोस्ट कर दिया लेकिन मैं इस पंक्ति को लेकर उलझता चला गया ...और ऐसा उलझा कि अब तक नहीं निकल पाया हूँ ...अपनी  उलझन आप सब के हवाले कर रहा हूँ...ज़रा लम्बी है लेकिन पढ़ें जरूर और अगर कोई हल नज़र आये तो जरूर बताएं

सोचता हूँ प्रेमगीत लिखूं
फिर सोचता हूँ गीत में
किसे अपना मीत लिखूं
लिखूं भी या न लिखूं
अगर लिख ही दिया कोई नाम
तो क्या होगा अंजाम
डरता हूँ कहीं बैठे बिठाये
कोई हो जाये न बदनाम
फिर सोचा लिखूं ही क्यों कोई नाम
प्रेमगीत ही तो लिखना है
लिखता हूँ बेनाम
प्रेम तो पवित्र अहसास है
जो हर दिल में बसता है
और गीत भावनाओं की अभिव्यक्ति का
एक सुन्दर सुगम सा रस्ता है
तो मैं नाम के चक्कर में क्यों पड़ता हूँ
आसान सा तो रास्ता है
इसी पे निकलता हूँ
इस समस्या का ज्यों ही हुआ समाधान
दूसरी तैयार थी करने लगी परेशान
बोली अरे नादान
थोडा तो खुद को पहचान
बिना चश्मे के तुझे दिखेगा क्या ?
लिखने तो तू बैठ गया
पर ये तो बोल
गीत में लिखेगा क्या ?
मैं हैरान थोडा परेशान
क्योंकि बात एकदम सही थी
और जो अब तक
मेरे दिमाग में नहीं जमी
ये वो ही दही थी
दही थी और सही थी
इसलिए मैंने भी खुद से ये बात
कई बार कही थी
कहा था थोडा इधर उधर निहारो
विषयवस्तु पर कुछ तो सोचो विचारो
पर खुद की सुने कौन ?
इसलिए मैं हो गया मौन
और मौन ही रहता
अगर ये मुझसे मदद के लिए न कहता
कहा, तो मैं मान गया
इसकी परेशानी को भी पहचान गया
इसकी परेशानी का एक ही हल है
चलना इसकी मर्जी, रास्ता सरल है
आंखें बंद करके अन्दर ही तो झांकना है
कोई तो है वहां बस उसे ही निहारना है
जो पाक है पवित्र है
सुन्दर सलौना चित्र है
रिश्ता बड़ा विचित्र है
फिर एक ही तो मित्र है
तनहाइयों का साथी
जैसे दिए की बाती
मेरी रात का उजाला 
मन में बसा शिवाला 
कभी गुनगुनी धूप सी
कभी चांदनी स्वरुप सी
कभी खिलती कली सी
कभी सोने में ढली सी
जिसे देख देख जीता
अमृत के घूँट पीता 
वो है तो मेरी हस्ती
उसमें ही जान बसती 
रगों में दौड़ते लहू सा
और भी न जाने क्या क्या
मैं सोचता चला जाता हूँ
और सोचते सोचते
बहुत दूर निकल जाता हूँ ...
फिर सोच में पड़ जाता हूँ
कि सोच भी क्या चीज़ है अजीब
कभी दुनिया से दूर कभी एकदम करीब
सोच, एक विकट मायाजाल है
जीवन का सबसे बड़ा जंजाल है
मैं अपनी सोच के इसी जंजाल में 
उलझता चला जाता हूँ
और लाख कोशिशों के बाद भी
एक प्रेमगीत नहीं लिख पाता हूँ ....
एक प्रेमगीत नहीं लिख पाता हूँ ....


कुछ हसरते परवाज़ की बातें करो...

किसने कहा अब राज की बातें करो
तुम इक नए अंदाज़ की बाते करो...

मन के दरवाजे पे दस्तक सी लगे
उस मधुर आवाज़ की बातें करो ...

झांकता सूरज क्षितिज के छोर से
फिर नए आगाज़ की बातें करो ...

सीख कुछ उड़ते परिंदों से सबक
कुछ हसरते परवाज़ की बातें करो...

छोड़ अब कल जिंदगी में क्या हुआ
आज से बस आज की बातें करो ...

बारिश की बूंदों सा कानों में बजे
ऐसे सुरीले साज़ की बातें करो ...

जिंदादिली जिसमें सराही जा रही
ऐसे किसी समाज की बातें करो ....

जिन्दगी को दे जो  नए मायने
उन नए अलफ़ाज़ की बातें करो ....

कर रहे तुम ये चकल्लस किसलिए
काम की कुछ काज की बातें करो

Comments

Poems aptly depicting the variety and depth of imagination of the multifaceted personality of the poet.
Kudos and best wishes

Thanks a lot Bandhuvar🙏🙏🙏

Waah, mazaa aaya!

शब्दों का बेहतरीन तालमेल। चाहे मां का दर्द हो या एक प्रेमी की उलझन सब आपने बेहतरीन तरीके से जताया है और अंत में आपकी नसीहत आज से बस आज की बात कर, काम से बात काज की बात कर,
अनमोल है सर।

हृदयस्पर्शी कविताएं। हमें आप पर गर्व है।

Heart touching poem. We are proud of you.

मुझे मेरी बिटिया याद आई

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